खमेर गम्हार Khamer/gambhari tree farming

खमेर(Khamer/gambhari tree) का पेड़ जिसका वानस्पतिक नाम “Gmelina arborea” है, बहुपयोगी, तेजी से बढ़ने वाला एवं सभी प्रकार की जलवायु में पाया जाने वाला पेड़ है।

यह पेड़ भारत में उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र एवं भारत के अतिरिक्त थाईलैंड, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, फिलिपींस, इन्डोनेशिया जैसे विश्व के अनेक देशों में पाया जाता है।

यह (Khamer/gambhari tree) का पेड़ अनेक प्रकार की औषधियों के निर्माण में सहायक है। इमारती लकड़ी के रूप में इसका स्थान सागौन (सागवान) के बाद दूसरा है। Khamer/gambhari tree की पत्तियां मवेशियों के चारे के रूप में अच्छी मानी जाती है तथा इनको खिलाने से मवेशियों में दूध की मात्रा बढ़ती है।

Khamer/gambhari tree की लकड़ी सागौन/सागवान के समान गुणवाली होती है। खमेर का उपयोग खिलौने, कृषि उपकरण एवं फर्नीचर निर्माण में होता है। खमेर कृषि वानिकी, वानिकी एवं सामुदायिक वानिकी के उद्देश्य से लगाया जाने वाला मुख्य पेड़ है।

khamer/gambhari tree

Khamer/gambhari का पेड़ कहा होता है  

सागौन की तरह खमेर भी बर्वीनेसी (Verbenaceae) परिवार का सदस्य है। स्थानीय भाषा में इसे गम्हार, कुम्भारी और सीवन भी कहते है।

खमेर एक मध्यम से बड़े आकार का पर्णपाती पेड़ है, जो कि प्राकृतिक रूप से भारत के अधिकांश भागों में 1500 मी. ऊंचाई तक पाया जाता है।

गांवों में इसे खेतों की मेड़ों पर लगाया जाता है क्योंकि इसकी जड़ जमीन में सीधे नीचे की ओर बढ़ती है तथा खेतों को नुकसान पहुंचाए बगैर इसके पेड़ तैयार किये जा सकते है। इसे पड़त भूमि पर भी लगाते है।

यह शुष्क, अर्द्धशुष्क तथा आर्द्र सभी प्रकार की जलवायु में पाया जाता है। इसका कापिस बहुत अच्छा आता है एवं तेजी से बढ़ता है।

इसके लिये सामान्य वार्षिक वर्षा 750-4500 मिमी. है। नम उपजाऊ घाटियों में जहां रेतीली दोमट मिट्टी होती है वहां इसकी बढ़त बहुत अच्छी होती है। यह शाखारहित सीधे तने वाला और ऊपर से विशाल छत्र वाला पेड़ है।

पूर्वी हिमालय क्षेत्रों में अरूणाचल प्रदेश और असम में यह 30 मीटर से ऊंचा हो जाता है। अधिकांशतः इसका आकार 1.5 मीटर से 2.0 मीटर गोलाई का होता है। मध्यप्रदेश के शुष्क वनों में मण्डला को छोड़कर इसकी गोलाई 0.9 मीटर से अधिक नहीं पहुंच पाती।

इसकी छाल चिकनी राख जैसी भूरी से हल्की पीली होती है जिस पर काले धब्बे होते है, छाल का भीतरी भाग बाहरी वातावरण के संपर्क में भूरा हो जाता है।

इसका फल 1.8-2.5 सेमी. लंबा और अंडाकार होता है। पकने पर यह चमकदार और पीला हो जाता है। इसके फल में सामान्यतः दो खंड और दो बीज होते है लेकिन कभी-कभी एक या तीन बीज भी पाये जाते है। एक बीज से सामान्यतः दो पौधे और कभी-कभी तीन पौधे उगते है।

जब पेड़ अधिकांशतः पर्णरहित होता है या फिर उस पर कुछ नये पत्ते आने शुरू होते है तब फरवरी से अप्रैल के मध्य इसमें फूल आने प्रारंभ होते है। इसके फल अप्रैल अंत से जून-जुलाई तक पकते

यह प्रकाशक्षेपी है लेकिन सागौन से अधिक छाया सह सकता है। अधिक सूखा और सूखी रेतीली मिट्टी में यह मर जाता है या फिर छोटे झाड़ीनुमा आकार में ही जीवित रह पाता है।

प्राकृतिक अवस्था में बीजों के गिरने के बाद वर्षा के आरंभ होते ही इनका अंकुरण प्रारंभ हो जाता है। इसके फल मवेशी द्वारा खा लिये जाते है और गोबर के साथ बीज निकाल दिये जाते है जो इसके बीजों को अलग-अलग क्षेत्रों में फैलाने में सहायक होता है।

प्राकृतिक पुनरूत्पादन कम होने का मुख्य कारण इस प्रजाति का वनों में छुटपुट रूप से पाया जाना भी है। इसके बीजों के कड़े छिलके को सड़ने में समय लगता है और अंकुरण अगले वर्षाकाल में ही हो पाता है। खमेर को बीजों द्वारा सीधे बोकर या प्रतिरोपण द्वारा कृत्रिम रूप से उगाया जा सकता है।

मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसे पहाड़ियों पर, ब्लाक रोपणों में, खेतों की सीमाओं (मेड़ो) पर, बीहड़ों में, सामाजिक वानिकी और कृषि वानिकी में, तथा ऊबड़ खाबड़ जमीन पर लगाया जा सकता है। फलों की खेती के साथ इसे लगाने से भूमि में नाईट्रोजन एवं फासफोरस की मात्रा बढ़ती है।

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Khamer/gambhari पेड़ का उपयोग

खमेर की ईमारती लकड़ी इसके वजन के अनुपात में अधिक मजबूत होती है। यह दीमकरोधी है। यह दरवाजों एवं खिड़की के पल्लों और फर्नीचर विशेषकर अलमारी आदि में काम आता है।

इसके हल्के होने तथा मजबूत और टिकाऊ होने से यह संगीत उपकरण बनाने के काम में भी आता है। इसे आसानी से मोड़ा जा सकता है।

यह चित्रों और स्लेट की फ्रेम के लिए ब्रश के हैंडल खिलौने और अन्य उपकरणों के हत्थे बनाने के लिए अत्यंत लोकप्रिय इमारती लकड़ी है।

इसका उपयोग चाय के केस बनाने, सामान्य उपयोग के प्लायवुड बनाने, ब्लैकबोर्ड और फ्लश दरवाजों के पल्लों, कार फ्रेम और क्रासबैंड में भी किया जाता है।

उपकरण उद्योग में इसकी लकड़ी का उपयोग ज्यादातर ड्राइंगबोर्ड बनाने, प्लेन टेबल, उपकरण रखने के डिब्बे बनाने में किया जाता है।

इसे कृत्रिम अंग में भी उपयोग किया जाता है। यह टेनिस रैकेट के हैंडल तथा फ्रेम और केरम बोर्ड की फ्रेम के लिये भी स्वीकृत ईमारती लकड़ी है। इसे कागज और माचिस उद्योग में भी उपयोग किया जाता है।

खमेर की पत्तियां मवेशियों के लिए अच्छी मानी जाती है और इसमें प्रोटीन 11.9 प्रतिशत है इसे रेशम के कीड़ो को खिलाने में भी इसका उपयोग किया जाता है।

खमेर की छाल एवं जड़ पेटदर्द, जलन, बुखार, त्रिदोष, बवासीर, मतिभ्रम आदि में उपयोगी है तथा भूख बढ़ाती है।

खमेर की पत्तियों को पीसकर सिरदर्द से राहत में भी उपयोग किया जाता है। इसके फूल कुष्ठ रोग और खून संबंधी बीमारियों में उपयोगी है।

आयुर्वेद में यह देखा गया है कि इसका फल एक बलवर्धक टॉनिक, एस्ट्रिजेंट, केशवर्धक, वात, एनीमिया, कुष्ठरोग तथा अल्सर में उपयोगी है।

सांप के काटने और बिच्छू के डंक में उपचार के लिए भी इसका उपयोग होता है। सांप के काटने पर इसकी छाल और जड़ का काढ़ा पिलाना चाहिए।

खमेर की पत्तियों के रस से अल्सर की चिकित्सा भी की जाती है। आयुर्वेदिक औषधि “दशमूलारिस्ट” के तैयार करने में खमेर की जड़ का उपयोग किया जाता है।

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1 thought on “खमेर गम्हार Khamer/gambhari tree farming”

  1. हमारे खेत मे हमने 200 पेड़ खमहेर लगाए थे, 50 खमेर के पेड़ हमने 20 साल में तैयार किये, पर अब इन पेड़ों को कहाँ बेचे समझ नही आता।
    नार्मल टाल वाले इसको किलो के भाव मे बहुत सस्ते जलाऊ लकड़ी के भाव खरीदने को बोलते है, कृपया सलाह दे।

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